उत्तर रेलवे में 37 साल तक सेवाएं देने वाले उत्तर रेलवे से रिटायर सीनियर सेंक्शन इंजीनियर 70 वर्षीय देविंदरपाल सिंह की पेंशन कटौती मामले में कैट ने अहम फैसला सुनाया है। ट्रिब्यूनल ने राष्ट्रपति के 23 अक्टूबर, 2013 को जारी उस आदेश को खारिज कर दिया है,
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ट्रिब्यूनल ने माना कि संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की सलाह रिपोर्ट पर याची को सफाई का मौका दिए बिना राष्ट्रपति से दंडात्मक फैसला पारित करा लिया गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन है। कैट ने रेलवे को 8 सप्ताह के अंदर बकाया पेंशन का भुगतान करने का फैसला दिया है।
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पंजाब के फिरोजपुर सिटी के फ्रेंड्स कॉलोनी निवासी पीड़ित देविंदरपाल सिंह ने अक्टूबर 1971 में नॉर्दर्न रेलवे में असिस्टेंट परमानेंट इंस्पेक्टर के रूप में जॉइन किया था। फिरोजपुर डिवीजन में 37 साल सेवा दी और 7 अप्रैल 2008 में उन्हें विभाग द्वारा जबरन अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी गई। उनके खिलाफ रेलवे सामग्री की खरीद संबंधी इंडेंट में अनियमितताओं के आरोप में 9 अप्रैल 2008 को चार्जशीट जारी की गई थी।
जांच अधिकारी ने 14 जुलाई 2010 की रिपोर्ट में एक आरोप सिद्ध और दूसरा आरोप सिद्ध नहीं पाया। प्राधिकारी ने जांच अधिकारी के निष्कर्षों से असहमति जताई और यूपीएससी से परामर्श के बाद राष्ट्रपति ने रेलवे सर्विसेज (पेंशन) रूल्स, 1993 के नियम 9 के तहत 23 अक्टूबर 2013 को 3 साल के लिए मासिक पेंशन में 20% कटौती का आदेश पारित किया।
पीड़ित की ओर से दलील दी गई यूपीएससी की सलाह-रिपोर्ट (साल 4 अक्टूबर, 2012) केवल अंतिम दंडात्मक आदेश (23 अक्टूबर, 2013) के साथ मुहैया कराई गई थी। अंतिम फैसला पारित करने से यूपीएससी की रिपोर्ट पर अपनी बात या सफाई रखने का कोई मौका नहीं दिया गया।
मामले में शामिल अन्य अधिकारी (एनके कोहली और भारत भूषण गुप्ता) को केवल निंदा की मामूली सजा दी गई थी। जिस अधिकारी ने चार्जशीट जारी की, उसने स्वयं उन इंडेंट (सामग्री मांग पत्रों) को मंजूरी दी थी, इसलिए वह अनुशासनात्मक प्राधिकारी बनने के लिए अयोग्य था।
मामले से जुड़े आपराधिक मामले में सीबीआई द्वारा क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की गई थी, जिसे कोर्ट ने मंजूरी दी थी। तर्क दिया कि का दंडात्मक आदेश राष्ट्रपति द्वारा रेलवे सेवा (पेंशन) नियम, 1993 के नियम 9 के तहत सक्षम प्राधिकारी के रूप में विधिवत पारित किया गया था।
फैसला सुनाने से पहले अग्रिम में यूपीएससी रिपोर्ट देने या उस पर जवाब मांगने का कोई वैधानिक नियम नहीं है। आयोग ने कोई नया साक्ष्य नहीं लिया था, बल्कि केवल अनुशासनात्मक प्राधिकारी के प्रस्ताव से सहमति जताई थी।