October 25, 2026

100 से ज्यादा बकरों की बलि देकर बैगा ने पीया खून! शरद पूर्णिमा पर यहां निभाई जाती है अनूठी परंपरा, जानिए क्या है महत्व | IBC24

रायगढ़। छत्तीसगढ़ के आदिवासी बाहुल्य रायगढ़ जिले में शरद पूर्णिमा पर आस्था और परंपरा का अनूठा संगम देखने को मिलता है। जिला मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर घने जंगलों के बीच बसे वनग्राम करमागढ़ में मां मानकेश्वरी के मंदिर में सदियों पुरानी बलि प्रथा आज भी निभाई जाती है। यहां शरद पूर्णिमा पर देवी को बकरों की बलि चढ़ाई जाती है। इसके बाद ढोल-नगाड़ों की थाप पर नृत्य करते हुए मंदिर का मुख्य बैगा बलि के बाद निकले रक्त का पान करता है। स्थानीय लोगों के अनुसार यह परंपरा करीब 500 साल पुरानी है। इस साल भी मंदिर में 100 से अधिक बकरों की बलि दी गई।

रायगढ़ राजपरिवार की कुलदेवी हैं मां मानकेश्वरी

रायगढ़-हमीरपुर मार्ग पर ओडिशा सीमा के पास स्थित मां मानकेश्वरी मंदिर आदिवासी समाज की आस्था का प्रमुख केंद्र है। मां मानकेश्वरी को रायगढ़ राजपरिवार की कुलदेवी भी माना जाता है। यही वजह है कि हर साल शरद पूर्णिमा पर राजपरिवार के सदस्य यहां विशेष पूजा-अर्चना करने पहुंचते हैं। इस अवसर पर मंदिर परिसर में मेला भी लगता है, जिसमें दूर-दराज के गांवों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। मान्यता है कि मां मानकेश्वरी के दरबार में मांगी गई मन्नत पूरी होती है। संतान प्राप्ति, परिवार की सुख-समृद्धि और कष्टों से मुक्ति की कामना लेकर श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। मनोकामना पूरी होने पर अगले साल शरद पूर्णिमा में बकरा और नारियल चढ़ाने की परंपरा है।

जमीन पर लेटकर बैगा से आशीर्वाद लेती हैं महिलाएं

मंदिर में बलि पूजा की शुरुआत राजपरिवार की ओर से पहली पूजा और पहले बकरे की बलि के साथ होती है। इसके बाद मुख्य बैगा ढोल-नगाड़ों की थाप पर नृत्य करते हुए मंदिर परिसर में पहुंचता है। यहां सैकड़ों महिलाएं खुले बालों के साथ जमीन पर लेटकर उसे दंडवत प्रणाम करती हैं। नृत्य करते हुए बैगा जिन महिलाओं के सिर पर हाथ फेरता है, उसे देवी का आशीर्वाद माना जाता है। स्थानीय मान्यता है कि विशेष पूजा के दौरान बैगा के शरीर में स्वयं मां मानकेश्वरी विराजमान होती हैं। इसके बाद श्रद्धालुओं की ओर से लाए गए बकरों की बलि दी जाती है और मुख्य बैगा उनका रक्तपान करता है।

अंगूठी कसने को माना जाता है देवी के आगमन का संकेत

मंदिर से जुड़ी एक अन्य मान्यता के अनुसार शरद पूर्णिमा की पूर्व संध्या पर देवी स्वयं ओडिशा से करमागढ़ पहुंचती हैं। अगले दिन मुख्य बैगा उनकी विशेष पूजा करता है। इस दौरान राजपरिवार की ओर से बैगा के अंगूठे में एक ढीली अंगूठी पहनाई जाती है। मान्यता है कि पूजा के दौरान अंगूठी का कस जाना बैगा के शरीर में देवी के विराजमान होने का संकेत होता है। इसके बाद बलि पूजा की रस्म शुरू की जाती है।

35 साल तक बीरबल सिदार निभाते रहे मुख्य बैगा की जिम्मेदारी

इस साल मंदिर में मुख्य बैगा के रूप में श्यामलाल सिदार ने पूजा की जिम्मेदारी संभाली। इससे पहले गांव के बीरबल सिदार लगातार 35 वर्षों तक मुख्य बैगा के रूप में सभी धार्मिक रस्में निभाते रहे। बीरबल सिदार के मुताबिक पूजा के दौरान उन्हें एक अलग तरह की अनुभूति होती थी। ढोल की थाप पर नृत्य करते समय उन्हें स्वयं पता नहीं चलता था कि वे क्या कर रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। उनके पूर्वज भी इसी तरह मां मानकेश्वरी की पूजा करते थे। आज भी ग्रामीण उसी आस्था के साथ इन रस्मों का पालन कर रहे हैं। शरद पूर्णिमा पर आयोजित इस अनूठी पूजा को देखने हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु करमागढ़ पहुंचते हैं।

  • मनरेगा की खुदाई में जमीन से निकला नर कंकाल, छत्तीसगढ़ के इस जिले में मची सनसनी, पास ही मिले ये सामान भी
  • निवेशकों की निकल पड़ी! अगले हफ्ते 9 IPO की दस्तक, किसमें छिपा है मुनाफे का खजाना और किससे रहना होगा सावधान? 
  • 'तुम लोग क्या झक मरा रहे हो', जिला पंचायत उपाध्यक्ष के बिगड़े बोल, पुलिसकर्मियों को दी धमकी, देखें वीडियो 
  • 6 महीने में ही 23 लोगों को सुनाई मौत की सजा, अब जज का हुआ हुआ तबादला, जानिए HC ने क्यों दिया ट्रांसफर का आदेश 
  • आखिर 'रामायण' में ऐसा क्या? जो 10 दिन पहले टिकटों की मारामारी, क्या रिलीज से पहले ही टूटेंगे सारे रिकॉर्ड? 
  • इस मंगलवार बंद रहेंगी प्रदेश की शराब दुकानें, जानें सरकार ने क्यों घोषित किया है 27 अक्टूबर को ड्राई डे