Published: Friday, July 31, 2026, 19:06 [IST]
भारत में 10 साल की सरकारी सिक्योरिटीज (G-sec) की नीलामी शुक्रवार, 31 जुलाई 2026 को होने वाली है। यील्ड (yields) में हो रहे बदलावों के बीच निवेशक अब रिटेल डायरेक्ट, टारगेट मैच्योरिटी फंड्स और बैंक एफडी (FD) जैसे विकल्पों की तुलना कर रहे हैं। बोली लगाने से पहले मार्केट प्राइसिंग को समझना एक बेहतर आधार साबित हो सकता है। 28 जुलाई को 10 साल वाली सिक्योरिटी 6.78 प्रतिशत के करीब बंद हुई थी, जिससे आज की उम्मीदों और निवेश के फैसलों का फ्रेमवर्क तैयार होता है।
हालिया साप्ताहिक नीलामियों ने बाजार का मूड बदला है और डीलर्स कट-ऑफ पर अच्छी डिमांड देख रहे हैं। जुलाई 2026 के मध्य में, नीलामी के दौरान आए उतार-चढ़ाव के बाद 10 साल की यील्ड बढ़कर करीब 6.78 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। ट्रेड डेस्क ने इस महीने की अन्य सेल में भी मजबूत बिडिंग के संकेत दिए हैं। उम्मीद है कि आज का कट-ऑफ सेकेंडरी मार्केट की यील्ड के आसपास ही रहेगा, जिसमें थोड़ा-बहुत नीलामी प्रीमियम या डिस्काउंट देखने को मिल सकता है।

पूरे जुलाई के दौरान, बेंचमार्क 6.94% GS 2036 करीब 6.73–6.90 प्रतिशत के दायरे में रहा। कच्चे तेल की कीमतों और अमेरिकी यील्ड के हिसाब से इसमें उतार-चढ़ाव देखा गया। जुलाई के आखिर में जानकारों ने 6.80–6.82 प्रतिशत को एक अहम स्तर (pivotal zone) माना है। 2036 वाली लाइन के पास G-sec फ्यूचर्स भी इसी स्तर के आसपास दिख रहे हैं। आज का कट-ऑफ भी आमतौर पर इसी सेकेंडरी कर्व के करीब रहने की उम्मीद है।
रिटेल डायरेक्ट: नॉन-कंपेटिटिव बिड्स, टिकट साइज और सेटलमेंट की पूरी जानकारी
रिटेल डायरेक्ट के जरिए हर सिक्योरिटी के लिए एक नॉन-कंपेटिटिव बिड (non-competitive bid) लगाई जा सकती है, जिसका अलॉटमेंट वेटेड-एवरेज नीलामी यील्ड पर होता है। कुल नोटिफाइड रकम का पांच प्रतिशत हिस्सा ऐसी बिड्स के लिए रिजर्व रहता है; अगर डिमांड ज्यादा हो, तो प्रो-राटा (pro-rata) आधार पर अलॉटमेंट किया जाता है। इसमें कम से कम ₹10,000 और उसके मल्टीपल में निवेश किया जा सकता है, जबकि एक बिड अधिकतम ₹2 करोड़ (फेस वैल्यू) तक की हो सकती है। फंड कन्फर्मेशन के बाद सिक्योरिटीज T+1 बेसिस पर क्रेडिट हो जाती हैं।
| निवेश का विकल्प | अनुमानित प्री-टैक्स यील्ड | टैक्स से जुड़ी अहम बातें |
|---|---|---|
| 10Y G-sec (सेकेंडरी) | 6.75%–6.85% (पिछला: 6.78%) | कूपन पर स्लैब के हिसाब से टैक्स; लिस्टेड LTCG बिना इंडेक्सेशन के 12.5% |
| टारगेट मैच्योरिटी फंड (G-sec) | ~6.84%–6.96% YTM (हालिया फैक्टशीट्स) | 1 अप्रैल, 2023 के बाद की खरीद पर टैक्स स्लैब के अनुसार लगेगा |
| बैंक FD (प्रमुख सरकारी दरें) | चुनिंदा बैंकों में करीब 8.10% तक | ब्याज पर स्लैब के हिसाब से टैक्स; समय से पहले पैसे निकालने पर पेनल्टी |
टारगेट-मैच्योरिटी फंड्स (TMFs) पोर्टफोलियो की मैच्योरिटी को एक तय तारीख से जोड़ते हैं, जिससे अलग-अलग वर्षों के लिए निवेश की प्लानिंग (laddering) करना आसान होता है और री-इन्वेस्टमेंट रिस्क कम हो जाता है। हालांकि, जैसा कि स्टडीज और ट्रैकर्स बताते हैं, मैच्योरिटी से पहले निकलने पर ड्यूरेशन के कारण NAV में उतार-चढ़ाव का जोखिम रहता है। FD में रिटर्न की निश्चितता तो है, लेकिन बड़े बैंक समय से पहले पैसे निकालने पर करीब एक प्रतिशत पेनल्टी वसूलते हैं। G-secs को रिटेल डायरेक्ट के NDS-OM एक्सेस के जरिए बेचा जा सकता है, लेकिन इसमें कीमतों का जोखिम (price risk) बना रहता है।
टारगेट मैच्योरिटी फंड्स बनाम बैंक FD: टैक्स का गणित और फायदे
अब निवेश के फैसलों में टैक्स की भूमिका सबसे अहम हो गई है। 1 अप्रैल, 2023 या उसके बाद खरीदे गए डेट TMFs पर आपके टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स लगता है, चाहे आप उसे कितने भी समय तक होल्ड करें। 12 महीने के बाद लिस्टेड G-sec बेचने पर बिना इंडेक्सेशन के 12.5 प्रतिशत लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) टैक्स लगता है; जबकि इसके ब्याज पर स्लैब के हिसाब से टैक्स देना होता है। कई बड़े बैंक 7–8 प्रतिशत ब्याज वाली FD का विज्ञापन देते हैं, लेकिन निवेश से पहले टैक्स के बाद मिलने वाले असल रिटर्न की तुलना जरूर कर लें।
Story first published: Friday, July 31, 2026, 19:06 [IST]
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