नेपाल की अर्थव्यवस्था में पानी सिर्फ प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि बिजली और उससे होने वाली कमाई का बड़ा आधार है. देश की लगभग 100% बिजली हाइड्रोपावर से आती है. मानसून में नदियों का जलस्तर बढ़ने पर नेपाल अपनी जरूरत से ज्यादा बिजली पैदा करता है और इसका एक हिस्सा भारत और बांग्लादेश को भी बेचता है. इससे हर साल करीब 200 मिलियन डॉलर यानी लगभग ₹1,600 करोड़ की कमाई होती है. लेकिन 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ ने इसी मॉडल की सबसे बड़ी कमजोरी सामने ला दी.
जिस पानी से नेपाल बिजली बनाकर कमाता है, वही पानी अब उसके पावर प्लांट, सड़क, पुल और ट्रांसमिशन नेटवर्क के लिए बड़ा खतरा बन गया है. हाल में आई बाढ़ की वजह से नेपाल की बिजली उत्पादन क्षमता का करीब 10% हिस्सा प्रभावित हुआ. न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, करीब 431 MW क्षमता पर असर पड़ा. नतीजा यह हुआ कि नेपाल को कुछ समय के लिए निर्यात रोकना पड़ा और घरेलू जरूरत पूरी करने के लिए भारत से बिजली लेनी पड़ी.

225 हाइड्रोपावर प्लांट, 3,900 MW से ज्यादा क्षमता
नेपाल ने पिछले डेढ़ दशक में हाइड्रोपावर को तेजी से बढ़ाया है. 2010 के आसपास देश में रोजाना 16 घंटे तक बिजली कटौती होती थी. अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है. नेपाल के पास करीब 225 हाइड्रोपावर प्लांट और 3,900 MW से ज्यादा क्षमता है. सैकड़ों और परियोजनाएं निर्माण या विकास के अलग-अलग चरणों में हैं.
यही वजह है कि हाइड्रोपावर अब नेपाल के लिए विदेशी मुद्रा कमाने का जरिया भी बन गया है. नेपाल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी की 2024-25 की रिपोर्ट के मुताबिक, नेपाल ने इस वित्त वर्ष भारत को 2,380 GWh बिजली बेची थी, जो पिछले साल से 22% ज्यादा थी. इसी दौरान भारत से 1,681 GWh बिजली खरीदी भी थी. नेपाल ने भारत के ट्रांसमिशन नेटवर्क के जरिए बांग्लादेश को बिजली भेजना शुरू किया था. 2025 में शुरुआती मात्रा 40 MW थी.

बाढ़ ने पूरा समीकरण बदल दिया
नेपाल की ज्यादातर हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स पहाड़ी और नदी घाटियों वाले इलाकों में हैं. यहां तेज बहाव वाली नदियां बिजली बनाने के लिए फायदेमंद हैं, लेकिन यही भौगोलिक स्थिति बाढ़, भूस्खलन और अचानक आने वाले पानी के सामने इन परियोजनाओं को कमजोर भी बनाती है. 26 अगस्त की बाढ़ ने त्रिशूली और भोटेकोशी नदीं में भारी तबाही मचाई. कई हाइड्रोपावर परियोजनाएं क्षतिग्रस्त हुईं.
रायटर्स के मुताबिक, प्रभावित क्षेत्र में 11 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स को बड़ा नुकसान हुआ और बीमा कंपनियों को अकेले हाइड्रोपावर से जुड़े नुकसान में 130 मिलियन डॉलर से ज्यादा के दावे की आशंका है. बाढ़ जैसी आपदाओं की वजह से पावर प्लांट तक पहुंचने वाली सड़क टूट जाती है. इस वजह से मरम्मत टीम वहां पहुंच नहीं पाती. वहीं ट्रांसमिशन लाइन टूटने पर प्लांट बिजली पैदा करने के बावजूद उसे ग्रिड तक नहीं भेज सकता. यानी हाइड्रोपावर सिस्टम की एक कड़ी टूटने पर पूरा नेटवर्क प्रभावित हो सकता है.
सबसे बड़ा खतरा- बदलता हिमालय
इस आपदा ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है, क्या नेपाल की हाइड्रोपावर परियोजनाएं ऐसे मौसम के लिए तैयार हैं जो पहले की तुलना में ज्यादा अनिश्चित और खतरनाक हो रहा है? इसका मतलब यह है कि पुराने मौसम के आंकड़ों के आधार पर बनाई गई परियोजनाओं के लिए भविष्य का जोखिम ज्यादा हो सकता है.
फिर भी नेपाल हाइड्रोपावर बढ़ाने की तैयारी में
बाढ़ के बावजूद नेपाल ने हाइड्रोपावर विस्तार की योजना छोड़ी नहीं है. नेपाल अगले दशक में अपनी हाइड्रोपावर क्षमता को तीन गुने से ज्यादा करने की महत्वाकांक्षी योजना पर काम कर रहा है. भारत की कंपनियां भी इन परियोजनाओं में निवेश की इच्छुक हैं. लेकिन अगर नई परियोजनाएं बाढ़ और भूस्खलन के जोखिम वाले इलाकों में बनती रहीं, तो एक बड़ी प्राकृतिक आपदा एक साथ बिजली उत्पादन, निर्यात, इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेश को भी नुकसान पहुंचा सकती है. यानी नेपाल की सबसे बड़ी ताकत भी पानी है और सबसे बड़ा प्राकृतिक जोखिम भी पानी ही बनता जा रहा है.
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शुभेंदु प्रताप भूमंडल
पत्रकारिता में बीते 5 साल से सक्रिय हैं. नेशनल और इंटरनेशनल न्यूज राइटिंग का अनुभव. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से साइंस में ग्रेजुएशन, फिर माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से पत्रकारिता और वीडियो प्रोडक्शन की पढ़ाई. दैनिक भास्कर डिजिटल से करियर की शुरुआत. बतौर न्यूज ब्रीफ एडिटर भास्कर डिजिटल में 800 से ज्यादा बाइलाइन स्टोरी. वीडियो स्क्रिप्टिंग का भी अनुभव. अगस्त 2025 से टीवी9 डिजिटल के साथ नई पारी का आगाज.
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